Revisiting the timeless classic of Anand with its iconic dialogues

Friday marks the Golden Jubilee of Anand, which was released on 12 March 1971. Even after 50 years of Anand, its timeless classic has not faded away from audiences’ minds. Let’s walk through the memory lane, and revisit some of the portentous dialogues of Anand.

50 years of Anand: Iconic dialogues of Anand movie

The Ganga Times, Bollywood: ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्मित ‘आनंद’ (Hrishikesh Mukherjee’s Anand Film) को आज 50 साल हो गए। 12 मार्च 1971 को रिलीज़ हुई इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना (Amitabh Bachchan & Rajesh Khanna) मुख्य भूमिका में नज़र आये थे। आज भी अमिताभ और राजेश की जोड़ी को काफी पसंद किया जाता है। आनंद हमें सिखाती है कि मौत के आगोश में भी जिंदगी को खुलकर कैसे जियें। राजेश खन्ना का किरदार हमें बता जाता है कि मौत से डर के नही बल्कि इसका आनंद लेकर जीना चाहिए।

अंग्रेज़ी के कुछ शब्द उधार में लेकर कहे तो आनंद भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) में एक ‘क्लासिक कल्ट’ (Classic Cult Movie) का दर्जा पा लेने वाली फिल्म है। इस फ़िल्म के गाने और डायलॉग्स आज भी काफी लोकप्रिय है।

Iconic Dialogues of Anand Movie: 50 Years of Anand

Rajesh Khanna: Dialogues of Anand Movie

आज फ़िल्म की गोल्डन जुबली (Anand Film Golden Jubilee) के अवसर पर आइए पढ़ते है इसके कुछ जबरदस्त डायलॉग्स। साथ ही आपको यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के डायलॉग्स गुलज़ार साहब (Gulzar Sahab) द्वारा लिखे गए थे।

● “ज़िन्दगी और मौत उपरवाले के हाथ में है, जहाँपनाह। इसे ना तुम बदल सकते हो न मैं। हम सब इस रंगमंच के कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपरवाले की उंगलियों में बंधी हैं, कब, कौन, कैसे उठेगा यह कोई नहीं बता सकता है!।”
“Zindagi aur maut uparwaale ke haath mein hai, jahaanpanaah. Ise na tum badal sakte ho na main. Hum sab is rangmanch ke kathputliyaan hain, jinki dor uprwaale ki ungaliyon me bandhi hai. Kab, kaun, kaise uthega yah koi nahin bata sakta hai.”

● बाबूमोशाय ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए लम्बी नहीं…
(Babumoshai… Zindagi badi honi chahiye, lambi nahin”)

● आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं …
(Anand mara nahin, Anand marte nahin)

● जब तक ज़िन्दा हूँ तब तक मरा नही,
जब मर गया साला मैं ही नही…
(Jab tak jinda hoon tab tak mara nahin, jab mar gaya sala main hi nahin)

● मौत तो एक पल है…
(Maut to ek pal hai…)

● जीना तो बम्बई में,
मरना तो बम्बई में…
(Jeena to Bambai me, marna to bambai me)

● लोग ज़िन्दगी का सबसे छोटा,
सबसे कीमती लफ्ज़ भूल गए है — प्यार।
(Log jindagi ka sabse chhota, sabse keemati lafz bhool gaye hain — Pyar)

यह कुछ लोकप्रिय एवं गुलज़ार साहब की कलम से निकले गहरे डायलॉग्स (Dialogues of Anand by Gulzar) थे। आनंद एक जीने की कहानी है, अगर आपने नही देखी तो ज़रूर देखिए। (Anand is the story of life).
बाकी, जाते-जाते इसी फिल्म की एक कविता लिखे जा रहे हैं जो अमिताभ बच्चन की आवाज़ में फ़िल्म में पेश की गई थी। ‘मौत, तू एक कविता है’ शीर्षक कविता को गुलज़ार साहब ने शब्दबद्ध किया है। (Maut too ek kavita hai- Anand Film’s poem written by Gulzar and recited by Amitabh Bachchan.)

50 years of Anand: Amitabh Bachchan: Anand Movie poem by Gulzar

मौत तू एक कविता है,
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुचे,

दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन,

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको…

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