Tuesday, January 13
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138 साल का इलाहाबाद विश्वविद्यालय: शहर में गांव जैसी जगह, जहां ठहराव अभी ज़िंदा है

Established in 1887, the University of Allahabad is much more than an institution—it is an emotion, woven into the dreams and memories of generations. Its historic campus, cherished pride, and vibrant legacy inspire both alumni and students to reach for greatness, nurture hope, and make lifelong bonds in the embrace of wisdom and tradition.

Allahabad University
Allahabad University

इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जो क़रीब-क़रीब मुझे मेरे गांव सा लगता है. वही हरियाली, चिड़ियों का शोर, ऊंचे-ऊंचे पेड़ों की छांव, हरी घासों की कालीन, गर्मी में ठंडक और जाड़े में धूप! गांव की मिट्टी में गिर के चलना सीखा था, यहां गिरते हुए संभलना और चलते रहना सीखा. यह विश्वविद्यालय हमें शहर की अफ़रा-तफ़री से ज़रा दूर रखके सुकून के कुछ पल देता है.

गांव की भांति लोगों में ठहराव यहां अब भी बचा है. किसी कोने में, सामने आते जानने वाले से हाल-चाल पूछने और मुस्कुराने की फुर्सत बचा के रखी है वक़्त के झोले में, जो इस विश्वविद्यालय को ज़िंदा बनाकर रखने का बेहद ज़रूरी हिस्सा है.

कितनी भी तस्वीरें ले ली जाएं, कितनी भी यादें समेट ली जाएं, विश्वविद्यालय की गोद में थोड़ा और जी लेने का दिल करता है. पेड़ की पत्तियों की सरसराहटरूपी संगीत में खो जाने का अपना मज़ा है, जो या तो गांव में मिलता है या फिर हमारे अपने विश्वविद्यालय में. शहर के कांक्रीट में रहते हुए मिट्टी का स्पर्श कैंपस में ही मिलता है, ज़मीन पर बैठकर पढ़ना, खाना, दोस्तों संग महफ़िल लगाना ये सब हृदय स्पर्शी आनंद हमें यहीं मिलता है हमारे विश्वविद्यालय रूपी गांव में.

कैंपस में बच्चे आते हैं बड़े होकर जाते हैं, जाते क्या हैं बस जाने का रिवाज़ निभाते हैं. अपना अंश, बचपना, ठहाके सब कैंपस के कोने-कोने में, दर-ओ-दीवार में छोड़ जाते हैं और साथ ले जाते हैं अपने दिलों में, ज़हन में, किरदार में, इल्म में ओढ़-पहनकर थोड़ा सा विश्वविद्यालय, ठीक जैसे गांव को लेकर आए थे.

इसीलिए तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय, फ़कत् इलाहाबाद में नहीं है, ये भारत के तमाम और विश्वविद्यालयों में भी है, जो इलाहाबादी बच्चों, अध्यापक-अध्यापिकाओं के नाम से रहता है, देश-विदेश के तमाम अन्य पदों पर, गांव के खेतों-खलिहानों तक बसता है इसका अंश.

Prayagraj University
The University of Allahabad at Prayagraj

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों में एक आम बात है और ख़ास भी है, बस उन्हें ये जान भर पड़े कि फलां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पढ़े या पढ़ी हैं, बस फिर क्या बात है. उनकी मदद के लिए जान भी दांव पर लगा देंगे. एक और आम-ओ-खास परंपरा जो यहां की नसों में बसती है, जिसका लुत्फ़ हमने भी खूब उठाया है, वो ये है कि सीनियर्स को कैंटीन के आस-पास देखकर यहां के जूनियर्स के पेट चूहों की रण भूमि में तब्दील हो जाते हैं और ज़ुबान कुछ खा लेने की गुहार लगाने लगती है और सीनियर्स उतने ही प्यार से जूनियर्स के भरण-पोषण में अपना योगदान देते हैं. मज़ाल है किसी सीनियर के रहते कोई जूनियर एक रूपए भी खर्च कर दे, पैसे तो खर्च होंगे ही और जो चार बात सुननी पड़ेगी वो अलग. ये अपनापन भी मुझे मेरे गांव में ले जाता है.

हमारे दिलों में दो बड़े अज़ीज़ गांव बसते हैं, एक जहां आंखें खोली और दूजा जहां चेतना पाई, एक जहां अपनों से जुड़े रहना सीखा, दूजा जहां अनजानों को अपना बनाना सीखा, एक जहां चेहरे पहचाने थे पहली दफा, दूजा जहां चेहरे से पार भी जाना सीखा, एक हमारी जन्म भूमि है, दूजी शायद हृदय धरा है.

(समरोज़ जहां ‘नूर’ इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग में शोध छात्रा हैं. वे ज़िंदगी के तमाम पहलुओं पर कविताएं और ब्लॉग लिखती रहती हैं.)

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