Kota Factory Season 2 Review in Hindi: पास-फेल के बीच में काला-सफेद सा जो ज्ञान छुपा हैं, नया सीजन उस से पर्दा हटाता है

Kota Factory Season 2 Review in Hindi: जीतू भैया के मुँह से निकली हर बात कभी आपको गहरी सोच तो कभी नॉस्टेल्जिया में गोते लगाने के लिए मजबूर ज़रूर करती हैं।

Kota Factory Season 2 Review in Hindi
Kota Factory Season 2 Review in Hindi

कोटा फैक्ट्री सीजन 2 आज से नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम होने लगा हैं। 2019 में टीवीएफ द्वारा बनाया गया यह सीरीज देश की पहली ब्लैक एंड वाइट सीरीज थी। पहला सीजन यूट्यूब और टीवीएफ प्ले एप्प पर रिलीज़ हुआ था मगर पहले सीजन का नाम इतना हुआ कि अब इसका दूसरा सीजन नेटफ्लिक्स हैं। पहले सीजन की आईएमडीबी रेटिंग भी 9.2 हैं।

सीजन 2 की शुरुआत वैभव यानी मयूर मोरे से होती है जो महेश्वरी क्लासेज में अपने पहले दिन के लिए तैयार हो रहा होता हैं। दूसरी तरफ प्रोडिजी क्लासेज के बच्चे मैनेजमेंट में लड़ रहे होते हैं क्योंकि जीतू भैया अब वहाँ फिजिक्स नहीं पढ़ा रहे। सीरीज में आगे हमे पता चलता है कि जीतू भैया प्रोडिजी छोड़ अपना खुद का एक इंस्टिट्यूट खोलने जा रहे हैं। वैभव, मीना, मीनल, उदय और वर्तिका फिजिक्स जीतू भैया से ही पढ़ने के लिए उनके नए इंस्टिट्यूट से जुड़ जाते हैं। आगे सीरीज में IIT की पढ़ाई, परीक्षा और जीतू भैया के नए इंस्टिट्यूट को स्थापित करने में आ रहे संघर्ष को दिखाया गया हैं।

Kota Factory Season 2 Review in Hindi

इस नए सीजन में काफी कुछ नया और काफी कुछ पुराना सा भी है। हालांकि टीवीएफ दूसरा सीजन को हिट बनाने में निपुण हो चुका हैं। टीवीएफ से सबको सीखना चाहिए कि एक सीरीज का दूसरा सीजन बनाते वक्त क्या ध्यान में रखे और क्या नहीं! खैर, इस सीजन में नया यह है कि सीरीज की लेखनी में गहराई दिखती है। हस्तमैथून और माहवारी जैसी चीजों को बड़े ही सरल संवादों के साथ समझाने की कोशिश की गई हैं। जीतू भैया के मोटिवेशन वाली बातें भी इतनी सरल तरीके से लिखी गयी है कि वो भारी होते हुए भी भारीपन का एहसास नहीं करवाती। हालांकि जीतू भैया के मुँह से निकली हर बात कभी आपको गहरी सोच तो कभी नॉस्टेल्जिया में गोते लगाने के लिए मजबूर ज़रूर करती हैं।

Kota Factory Season 2 Review in Hindi
Jeetu Bhaiya has been splendid in Kota Factory Season 2 Review in Hindi

इस सीरीज के संवाद तो मजबूत है ही मगर सबसे ज्यादा मजबूत व सुंदर है इसकी सिनेमेटोग्राफी यानी कैमरे का काम। एक फ़िल्म या सीरीज जितना अपने संवादों से याद रखी जाती है उतना ही अपने दृश्यों से, इस सीरीज को ब्लैक एंड वाइट में देखते हुए भी सब काफी काव्यात्मक लगता हैं। काले सफेद को इतने बेहतरीन रूपक की तरह इस्तेमाल किया है कि आप वैभव और बाकी किरदारों के संघर्ष को महसूस करने लगते हैं। सब कुछ एक अच्छी प्लानिंग के साथ किया गया हैं।

आजकल ड्रोन शॉट का काफी चलन चला है, चिड़िया की नज़र से दृश्य दिखाने के लिए लोग कही भी ड्रोन शॉट डाल देते हैं। मगर टीवीएफ की टीम उसमे भी प्लानिंग करती है, एक सीन जहाँ जीतू भैया की कार सड़क पर भीड़ से अलग होती है और फिर ड्रोन शॉट दिखता है जिसमे कार के ऊपर जीतू भैया के नए इंस्टिट्यूट का लोगो नज़र आता हैं। यह सीन हमें बताता है कि कितनी बारीकी से सब काम को अंजाम दिया गया है। इस सीरीज के शॉट्स और फ्रेम्स पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है मगर उतना पढ़ने का किसी के पास समय नहीं।

इसलिए अब बात अदाकारों की अदाकारी पर कर लेते हैं।

जब भी कोई सीरीज बढ़िया ढंग से लिखी जाती है तब आधा काम तो वही हो जाता। बचा हुआ आधा काम पूरा करते है उसके अदाकार। जीतेन्द्र कुमार मोटिवेट करने में अब मास्टर हो चुके है। वो आँखों से बस कैमरा में देख भी ले तब भी सामने वाला मोटिवेटेड फील कर ही लेता हैं। मयूर मोरे इस सीजन में पिछले के मुकाबले ज्यादा बेहतर लगे है। बाकी रंजन राज की मासूमियत और आलम खान के मज़कियापन ने काफी जगह हँसाया हैं। कुछ नए किरदार भी इस सीजन में जुड़े हैं और जो पुराने है उन्होंने भी अपना जितना रोल था उतना अच्छे से निभाया हैं।

किशोरावस्था में एक बच्चा जब घर से दूर रहता है तब उसके साथ जितनी दिक्कते आती उन सारी दिक्कतों को अच्छे से दर्शाया गया हैं। सीरीज को देखते हुए आपको लगेगा कि लिखने वालों ने इसको पहले जीया हैं फिर लिखा है। सौरभ खन्ना और अभिषेक यादव ने अच्छी लिखाई की हैं। हर एपिसोड के अंत में जो मधुर संगीत आता है उसके लिए सिमरन होरा और कार्तिक राव को साधुवाद। ओवरऑल पांच एपिसोड का यह सीजन आपको बांध के रखेगा और नॉस्टेल्जिया के साथ ज़िन्दगी बेहतर तरीके से जीने का फॉर्मूला भी बताएगा।

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